बहरागोड़ा। संवाददाता
प्रकृति पूजा और आदिवासी आस्था के प्रमुख पर्व सरहुल का उत्सव इस वर्ष बहरागोड़ा प्रखंड में पूरे उल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। राजलाबांध पंचायत परिसर में आयोजित 7वें देशुआ सरहुल कार्यक्रम में मुंडारी समाज के लोगों की भारी भीड़ उमड़ी। चारों ओर पारंपरिक वेशभूषा में सजे महिला-पुरुष, लोकगीतों की मधुर धुन और मांदर की गूंज ने माहौल को पूरी तरह उत्सवमय बना दिया।
कार्यक्रम की शुरुआत सुबह पाहन खोका मुंडा द्वारा सखुआ (साल) वृक्ष की विधिवत पूजा-अर्चना से हुई। उन्होंने प्रकृति, जल-जंगल-जमीन और पूर्वजों का स्मरण करते हुए क्षेत्र की सुख-समृद्धि और शांति की कामना की। सरहुल पर्व के मूल भाव प्रकृति के प्रति आभार और संतुलन बनाए रखने का संदेश पूरे आयोजन में साफ तौर पर झलकता रहा।
दोपहर से ही आसपास के गांवों से लोग पारंपरिक पोशाक पहनकर कार्यक्रम स्थल पर पहुंचने लगे। महिलाएं रंग-बिरंगी साड़ियों और पारंपरिक आभूषणों में सजी हुई थीं, वहीं पुरुष भी अपनी सांस्कृतिक वेशभूषा में नजर आए। शाम होते-होते पूरा मैदान मांदर की थाप, नगाड़ों की गूंज और पारंपरिक गीतों से जीवंत हो उठा। ग्रामीणों ने सामूहिक नृत्य प्रस्तुत कर अपनी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का शानदार प्रदर्शन किया, जिसमें युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित विधायक समीर महंती ने कहा कि सरहुल केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव के गहरे संबंध का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि आज के समय में पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता पहले से अधिक है और ऐसे पर्व हमें अपनी जड़ों और परंपराओं से जुड़े रहने की प्रेरणा देते हैं।
विशिष्ट अतिथि समाजसेवी कुणाल महतो ने भी आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि इस तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम समाज में एकता और भाईचारे को मजबूत करते हैं। उन्होंने सभी लोगों को सरहुल पर्व की शुभकामनाएं देते हुए आयोजन समिति के प्रयासों की प्रशंसा की।
कार्यक्रम के दौरान कई अन्य जनप्रतिनिधि और गणमान्य लोग भी मौजूद रहे। इनमें प्रखंड अध्यक्ष असित मिश्रा, सांसद प्रतिनिधि गौरव पुष्टि, गौरी शंकर महतो, मदन मन्ना, खितिश मुंडा, चंदन सीट, तपन पैड़ा, पुरुषोत्तम सिंह, मंगल सिंह, देवदास मुंडा, बुद्धेश्वर मुंडा, डॉ. मुंडा, बीरेन सिंह, गोवर्धन सिंह, खकन मुंडा और सुखेंदु सिंह सहित अनेक लोग शामिल थे।
पूरे आयोजन के दौरान अनुशासन और पारंपरिक गरिमा का विशेष ध्यान रखा गया। कार्यक्रम ने न सिर्फ लोगों को सांस्कृतिक रूप से जोड़ने का काम किया, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं और विरासत से परिचित कराने का भी अवसर दिया। सरहुल के इस आयोजन ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि प्रकृति के साथ संतुलन और सामूहिकता ही समाज की असली ताकत है।