जमशेदपुर | विशेष रिपोर्ट
जमशेदपुर में हाथियों के भोजन और कॉरिडोर विकास के नाम पर वर्ष 2024 में विश्व हाथी दिवस के अवसर पर रोपे गए बांस समेत विभिन्न प्रजाति के 1.15 लाख पौधे अब वन विभाग के लिए सबसे बड़ा सवाल बन गए हैं। वन प्रमंडल के चाकुलिया रेंज में जिन दावों के साथ इस योजना को प्रचारित किया गया, उनकी जमीनी हकीकत पूरी तरह उलट नजर आ रही है। यक्ष प्रश्न खड़ा है कि इतने पौधे रोपे नहीं गये या फिर देखरेख के अभाव में सूख गये या फिर मवेशी चर गये।चाकुलिया के हवाई पट्टी क्षेत्र में वन प्रमंडल पदाधिकारी की उपस्थिति में भव्य समारोह आयोजित कर पौधा रोपण शुरू हुआ था। आश्चर्य की बात है कि समारोह स्थल के आसपास रोपे गये बांस के पौधे गायब हैं।
हालत ऐसी है कि कई इलाकों में न तो पौधों के निशान हैं और न सुरक्षा का कोई इंतजाम। इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि या तो पूरी प्रक्रिया कागजों में ही सिमट कर रह गई। या फिर इतनी बड़ी संख्या में पौधों की देखरेख में घोर लापरवाही बरती गई।
वन विभाग की कार्यशैली पर सवाल
इतने बड़े स्तर पर दावा करने के बाद भी विभाग के पास न स्पष्ट निगरानी का रिकॉर्ड है और न ही सुरक्षा की कोई ठोस व्यवस्था दिख रही है। स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं अगर पौधे थे, तो गायब कैसे हो गए? और अगर नहीं थे, तो आंकड़े कहां से आए ?
मवेशियों का बहाना या जिम्मेदारी से बचाव?
कुछ जगहों पर मवेशियों द्वारा नुकसान की बात सामने आ रही है, लेकिन सवाल यह है कि बिना सुरक्षा व्यवस्था के खुले में योजना क्यों छोड़ी गई? क्या यह सिर्फ जिम्मेदारी से बचने का तरीका है?
हाथियों के नाम पर योजना, नतीजा शून्य
जिस योजनाओं का उद्देश्य हाथियों के लिए भोजन और सुरक्षित कॉरिडोर तैयार करना था, वही अब खुद अव्यवस्था और संदेह का उदाहरण बन गई है।
हाथियों का आतंक: जन-धन पर भारी पड़ रही भोजन की कमी
जमशेदपुर और आसपास के ग्रामीण इलाकों में इन दिनों हाथियों की आवाजाही लगातार बढ़ती जा रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह जंगलों में भोजन की कमी बताई जा रही है।
खास बात यह है कि पर्याप्त भोजन नहीं मिलने के कारण हाथी अब शहर और गांवों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे बड़े पैमाने पर जन-धन की हानि हो रही है।
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किसानों पर सबसे ज्यादा असर
- खेतों में खड़ी फसल को हाथियों द्वारा रौंद दिया जा रहा है
- धान, सब्जी और अन्य फसलें पूरी तरह बर्बाद हो रही हैं
- कई किसानों की सालभर की मेहनत एक रात में खत्म हो रही है

घरों और जान-माल पर खतरा
- हाथियों के झुंड गांवों में घुसकर कच्चे मकानों को तोड़ रहे हैं
- खाने की तलाश में घरों पर हमला कर रहे हैं
- कई जगहों पर लोगों की जान तक जा चुकी है या गंभीर रूप से घायल हुए हैं
रात में दहशत का माहौल
- ग्रामीण रातभर जागकर हाथियों को भगाने की कोशिश करते हैं
- बच्चों और बुजुर्गों में भय का माहौल बना हुआ है
- गांवों में दहशत और असुरक्षा की भावना लगातार बढ़ रही है
सीधा कनेक्शन: फेल योजना का असर
विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का मानना है कि अगर हाथियों के लिए जंगल में पर्याप्त भोजन और कॉरिडोर की व्यवस्था होती, तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती।
यानी साफ है कि पौधारोपण जैसी योजनाओं की विफलता का सीधा असर अब आम जनता पर पड़ रहा है।
जनता में आक्रोश, जांच की मांग तेज
स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने इसे गंभीर अनियमितता बताते हुए उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि संभावित घोटाले की ओर इशारा करता है।
सीधे सवाल वन विभाग से:
1.15 लाख पौधों का वास्तविक रिकॉर्ड कहां है?
निगरानी और सुरक्षा के इंतजाम क्यों नहीं थे?
जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी?
डीएफओ का पक्ष नहीं मिल सका
इस पूरे मामले में सबाह आलम अंसारी, वन प्रमंडल पदाधिकारी, जमशेदपुर से “अबुआ खबर” द्वारा संपर्क स्थापित करने की कोशिश की गई।
लेकिन खबर लिखे जाने तक उनसे संपर्क नहीं हो सका, जिस कारण उनका आधिकारिक पक्ष इस रिपोर्ट में शामिल नहीं किया जा सका है।
जैसे ही विभाग का पक्ष प्राप्त होगा, उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
अगले भाग में: क्या है असली सच? वन विभाग के दावों की पड़ताल
इस मामले में कई बड़े सवाल अब भी अनुत्तरित हैं, जिनकी गहराई से जांच जरूरी है:
- क्या 1.15 लाख पौधों का आंकड़ा सिर्फ कागजों में ही सीमित है?
- क्या पौधारोपण में फंड के उपयोग में अनियमितता हुई है?
- क्या निगरानी और सुरक्षा के नाम पर सिर्फ औपचारिकता निभाई गई?
सूत्रों की मानें तो इस पूरे मामले में गंभीर लापरवाही के साथ-साथ वित्तीय गड़बड़ी की भी आशंका जताई जा रही है। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि के लिए आधिकारिक जांच जरूरी है।
जारी रहेगी पड़ताल
“अबुआ खबर” इस पूरे मामले की तह तक जाने के लिए:
- जमीनी स्तर पर साक्ष्य जुटा रहा है
- स्थानीय लोगों और कर्मचारियों से जानकारी ले रहा है
- और दस्तावेजों के आधार पर पूरी सच्चाई सामने लाने की तैयारी में है
अगले भाग में जानिए:
वन विभाग का पक्ष क्या है?
क्या कहते हैं अंदरूनी सूत्र?
और आखिर इस पूरे मामले में सच्चाई क्या है?