नई दिल्ली, 27 जून 2025 — राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले द्वारा संविधान की प्रस्तावना में प्रयुक्त शब्दों ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ को लेकर की गई टिप्पणी के बाद देश की राजनीति में नया भूचाल आ गया है। इस पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “RSS‑BJP को संविधान से चिढ़ है, इन्हें लोकतंत्र नहीं, मनुस्मृति जैसा शोषणकारी ढांचा चाहिए।”
होसबाले का बयान: प्रस्तावना के शब्दों पर सवाल
दिल्ली में एक आयोजन के दौरान दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि “संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों को 1976 में आपातकाल के दौरान जोड़ दिया गया था। इन शब्दों पर आज एक व्यापक सार्वजनिक बहस की आवश्यकता है।”
इस टिप्पणी को लेकर विपक्ष ने संघ पर लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों पर हमला करने का आरोप लगाया है।
राहुल गांधी का पलटवार: ‘नकाब उतर गया’
राहुल गांधी ने अपने आधिकारिक X (पूर्व ट्विटर) अकाउंट पर प्रतिक्रिया दी:
“RSS‑BJP को संविधान नहीं, मनुस्मृति चाहिए। वे चाहते हैं कि बहुजन, दलित और गरीबों से उनके अधिकार छीन लिए जाएं और उन्हें दोबारा उसी गुलामी के अंधकार में धकेल दिया जाए। हर देशभक्त भारतीय इस षड्यंत्र के खिलाफ आखिरी सांस तक संविधान की रक्षा करेगा।”
राहुल गांधी ने कहा कि यह बयान कोई संयोग नहीं, बल्कि संघ की वर्षों पुरानी विचारधारा का खुला ऐलान है — “नकाब अब पूरी तरह उतर चुका है।”
राजनीतिक हलचल और विरोध
राहुल गांधी के बयान के बाद कई विपक्षी दलों ने RSS और बीजेपी पर तीखे शब्दों में हमला बोला।
सीपीआई (एम) के महासचिव ने कहा कि “संघ की मंशा स्पष्ट है — भारत को एक धर्म-प्रधान, वर्ण-व्यवस्था पर आधारित राष्ट्र बनाना।”
कांग्रेस प्रवक्ता जयराम रमेश ने ट्वीट कर कहा, “होसबाले का बयान भारत के संविधान पर सीधा हमला है, जिसे हम किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं करेंगे।”
संविधान बनाम मनुस्मृति: विचारधारा की टकराहट
भारत के संविधान की आत्मा समानता, स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय पर आधारित है। दूसरी ओर, मनुस्मृति एक प्राचीन ग्रंथ है, जिसे दलित, पिछड़े और महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण माना गया है।
राहुल गांधी कई बार अपने भाषणों में यह स्पष्ट कर चुके हैं कि BJP‑RSS की विचारधारा संविधान की जगह मनुस्मृति पर आधारित भारत देखना चाहती है।
📜 इतिहास की पुनरावृत्ति या चेतावनी?
संविधान में ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ जैसे शब्दों को लेकर पहले भी विवाद उठते रहे हैं, लेकिन पहली बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उच्चस्तरीय नेता ने सार्वजनिक रूप से इन शब्दों पर बहस की मांग की है। इसने सत्ता और विपक्ष के बीच विचारधारा की रेखा को और स्पष्ट कर दिया है।