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मोहर्रम में ग़म और अकीदत से गूंजा रांची, इमाम हुसैन की शहादत की याद में निकला जुलूस

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रांची: इमाम ए हुसैन की शहादत की याद में राजधानी रांची में मुहर्रम का जुलूस अकीदतमंदी और ग़मगीन माहौल में निकाला गया। शहर के मेन रोड सहित कई इलाकों से बाजा-गाजे और ताजियों के साथ जुलूस निकला। शिया समुदाय के लोगों ने मातमी लिबास में सीनाज़नी और जंजीरी मातम कर इमाम हुसैन की कुर्बानी को याद किया।

हर तरफ या हुसैन या हुसैन के नारों से माहौल गूंज उठा। दर्जनों आकर्षक ताजिए निकाले गए, जो लोगों की अकीदत का प्रतीक रहे। यह दिन कर्बला की उस ऐतिहासिक जंग की याद दिलाता है, जब पैगंबर मोहम्मद (स) के नवासे इमाम हुसैन (अ) ने यजीद की बैअत से इनकार करते हुए शहीदी का रास्ता चुना।

इतिहास की वह कुर्बानी जो आज भी रुला देती है

अंजुमन इस्लामिया से जुड़े शाहीन अहमद ने बताया कि इमाम हुसैन, हजरत अली और बीबी फातिमा के बेटे थे। यजीद की सत्ता के खिलाफ आवाज़ उठाना आसान नहीं था, लेकिन इमाम हुसैन ने हक की राह चुनी। जब उन्हें यकीन हुआ कि यजीद इस्लामी उसूलों के खिलाफ है, तो उन्होंने उसकी बैअत को ठुकरा दिया।

हुसैन ने मदीना से मक्का और फिर कर्बला की ओर रुख किया, साथ में उनके बच्चे, महिलाएं और रिश्तेदार भी थे। इस दौरान कई अपनों की शहादत की खबर मिली लेकिन हिम्मत नहीं टूटी। हजरत जैनब और हज़रत अब्बास जैसे अपनों के साथ उन्होंने इस्लाम की बुनियाद को बचाने के लिए हर कुर्बानी दी। आशुरा के दिन, 10 मुहर्रम को कर्बला में उन्हें शहीद कर दिया गया।