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1888 से चली आ रही परंपरा! 6 जुलाई को बाड़ाघाट में क्या होगा खास ?

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चाकुलिया, पूर्वी सिंहभूम (रोहन सिंह)
हर साल जुलाई की शुरुआत होते ही दुबराजपुर गांव के बाड़ाघाट टोला की फिज़ाओं में कुछ खास गूंजने लगता है — ढोल-नगाड़ों की थाप, पाटा नाच की ताल, और तीन राज्यों की संस्कृति का संगम। परंपरा, श्रद्धा और उत्सव का यह संगम बाड़ाघाट सांस्कृतिक मेला है, जो इस साल भी 6 जुलाई को पूरे भव्यता के साथ आयोजित होने जा रहा है।

इस मेले की जड़ें साल 1888 तक जाती हैं, जब पहली बार गांव के बुजुर्गों ने कान्हाईश्वर पहाड़ पूजा के बाद इस सांस्कृतिक उत्सव की नींव रखी थी। तब से लेकर आज तक, यह मेला न केवल जारी है, बल्कि साल दर साल और भी अधिक भव्य होता जा रहा है।

इस बार की तैयारी भी जोर-शोर से चल रही है। 5 जुलाई को श्रद्धालु कान्हाईश्वर पहाड़ की पूजा करेंगे, और ठीक उसके अगले दिन — 6 जुलाई को — जब सूरज की पहली किरण खेतों पर पड़ेगी, मेला अपने पूरे रंग में नजर आएगा।

ग्राम प्रधान बैद्यनाथ हांसदा बताते हैं कि “यह मेला सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि हमारी पहचान है। पीढ़ियों से हम इसे मनाते आ रहे हैं, और यह हमारी एकता का प्रतीक बन चुका है।”

सांस्कृतिक मेला कमेटी के अध्यक्ष करमू हांसदा, सचिव अनूप कुमार मांडी और कोषाध्यक्ष शिवनाथ हांसदा ने साझा किया कि इस साल भी मेला में पाटा नाच, लोकनृत्य, और सांस्कृतिक मंच का आयोजन होगा, जहां स्थानीय कलाकार अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करेंगे।

सिर्फ झारखंड ही नहीं, इस मेले में पश्चिम बंगाल और ओडिशा से भी हजारों लोग जुटते हैं। दुकानदारों ने पहले से ही अपनी दुकानें सजानी शुरू कर दी हैं।

बाड़ाघाट का यह मेला महज एक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर है, जो आधुनिकता की दौड़ में भी अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है। और यही इसकी खूबसूरती है — जहाँ इतिहास, परंपरा और वर्तमान मिलकर एक ऐसा अनुभव रचते हैं, जिसे न भूला जा सकता है और न ही नज़रअंदाज़ किया जा सकता है।

तो इस 6 जुलाई, बाड़ाघाट में जरूर आइए — शायद आपको भी उस परंपरा से प्यार हो जाए, जो 136 सालों से दिलों में जिंदा है।