जमशेदपुर। शहर में प्रकृति पूजा का महापर्व सरहुल इस वर्ष भी पूरे उत्साह, श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जा रहा है। आदिवासी समाज के लिए यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक एकता का प्रतीक है।
सरहुल पर्व के अवसर पर सुबह से ही शहर के विभिन्न पूजा स्थलों पर आदिवासी समाज के लोग बड़ी संख्या में जुटने लगे। पुरुष और महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सजे-धजे नजर आए। पूजा स्थलों पर साल वृक्ष के नीचे विधिवत पूजा-अर्चना की गई, जो सरहुल पर्व का मुख्य केंद्र होता है।

ढोल-नगाड़ों की थाप और पारंपरिक गीतों की गूंज से पूरा वातावरण भक्तिमय और उत्सवमय बना रहा। लोग नृत्य करते हुए इस पर्व की खुशी जाहिर कर रहे थे। खासकर युवाओं और बच्चों में इस पर्व को लेकर विशेष उत्साह देखा गया।
इस बीच एक खास और प्रेरणादायक दृश्य भी सामने आया, जब शहर के प्रसिद्ध समाजसेवी पप्पू सरदार ने जाति और धर्म से ऊपर उठकर सरहुल पर्व में भाग लिया। वे सीतारामडेरा स्थित पौराणिक सरहुल पूजा स्थल पहुंचे, जहां उन्होंने पूरे विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की और आदिवासी परंपराओं का सम्मान किया।
पप्पू सरदार ने इस अवसर पर समाज में भाईचारा और समरसता का संदेश देते हुए महिलाओं के बीच वस्त्रों का वितरण भी किया। उनके इस कदम की स्थानीय लोगों ने सराहना की और इसे सामाजिक एकता की मिसाल बताया।
उन्होंने कहा कि सरहुल केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने वाला उत्सव है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे प्रकृति की रक्षा के लिए आगे आएं और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाएं।
सरहुल पर्व आदिवासी संस्कृति की पहचान है और यह समाज को जोड़ने का काम करता है। इस दिन लोग प्रकृति की पूजा कर उसके संरक्षण का संकल्प लेते हैं।
शहर में सरहुल के अवसर पर विभिन्न स्थानों पर कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है, जहां पारंपरिक नृत्य, गीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां लोगों को आकर्षित कर रही हैं।
कुल मिलाकर, जमशेदपुर में सरहुल पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि सामाजिक एकता, भाईचारे और पर्यावरण संरक्षण का भी मजबूत संदेश दे रहा है।