राँची। झारखंड आंदोलन के वरिष्ठ नेता और सामाजिक कार्यकर्ता दिलीप होता का निधन हाल ही में पुणे में हो गया। वे लंबे समय से ब्लड कैंसर से जूझ रहे थे।
दिलीप होता का जन्म पूर्वी सिंहभूम जिले के बहड़ागोड़ा प्रखंड के खामार गाँव में हुआ था। प्रारंभिक दौर से ही वे आदिवासी ठेका मज़दूरों के हक़ की लड़ाई में सक्रिय रहे। मेघाहातु बुरू आयरन खदान के शुरू होने के समय उन्होंने मजदूरों के अधिकारों की मजबूती से पैरवी की।
कोलकाता के विवेकानंद कॉलेज में रसायन शास्त्र के प्राध्यापक के रूप में कार्यरत रहते हुए भी उनका रुझान सामाजिक आंदोलनों की ओर रहा। गुवा गोलीकांड के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और सिंहभूम लौटकर झारखंड आंदोलन में सक्रिय हो गए।
बाद के वर्षों में वे महाराष्ट्र के ठाणे चले गए और शेतकारी आंदोलन से जुड़कर गेल ओम्बेड, भरत पटनकर तथा बहारू सोनवणे जैसे नेताओं के साथ किसान आंदोलन को मज़बूत किया।
अपने अंतिम दिनों में वे पुणे में अपनी जीवनसंगीनी डॉ. एन. मोटम के साथ रह रहे थे। बीमारी के बावजूद उन्होंने इलाज न कराने का निर्णय लिया। उनकी इच्छा थी कि जीवन के बचे हुए दिन वे अपने तरीके से जिएं, डॉक्टरों की सलाह और परहेजों में नहीं।
मृत्यु के बाद भी उन्होंने समाज को योगदान दिया। उनकी वसीयत के अनुसार उनका पार्थिव शरीर पुणे मेडिकल कॉलेज के एनाटॉमी विभाग को अध्ययन हेतु सौंपा गया।
जीवन भर समाज और आंदोलन को समर्पित रहने वाले दिलीप होता आजीवन संघर्ष और त्याग की मिसाल बने रहेंगे।