तमाम अभावों के बीच शिक्षा की लौ जलाकर दामिनी ने रचा मिसाल, मां बोलीं- बेटी ही मेरा गर्व और सपना है
चाकुलिया, संवाददाता रोहन सिंह की रिपोर्ट
झोपड़ी में रहने वाली, बिना पक्के घर की एक बेटी… लेकिन सपने बुलंद। पूर्वी सिंहभूम के चाकुलिया प्रखंड की दामिनी सबर ने वह कर दिखाया जो आज तक उसकी जाति की कोई लड़की नहीं कर सकी। गुलगुलिया (सबर) समुदाय से आने वाली दामिनी ने इंटरमीडिएट परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास कर समाज के लिए एक नई उम्मीद जगाई है।
कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय की छात्रा दामिनी ने 67 प्रतिशत अंक प्राप्त कर यह सिद्ध कर दिया कि हालात कितने भी कठिन हों, अगर इरादे मजबूत हों तो सफलता निश्चित है। अंग्रेजी में 53, हिंदी में 66, इतिहास में 71, राजनीति विज्ञान में 69 और भूगोल में 76 अंक पाकर उसने अपनी मेहनत का परिचय दिया है।
दामिनी के पिता का वर्षों पहले देहांत हो गया था। मां जसिन सबर झोपड़ी में रहकर मजदूरी कर किसी तरह गुजारा करती हैं, लेकिन उन्होंने कभी अपनी बेटी की पढ़ाई नहीं रुकने दी। गांव में सरकारी जमीन पर रह रहे गुलगुलिया समुदाय के अधिकांश लोग शिक्षा से दूर हैं, लेकिन दामिनी ने इस परंपरा को तोड़ा है।
“मैं पढ़ना चाहती हूं और अपने समाज के बच्चों को भी पढ़ाना चाहती हूं,” दामिनी की ये बातें उसके जज़्बे को बयां करती हैं। उसकी मां जसिन कहती हैं, “बेटी को पढ़ाकर ही मैं अपने जीवन का मकसद पूरा करूंगी।”
दामिनी की सफलता न केवल उसकी मां के त्याग और समर्पण की कहानी है, बल्कि यह सामाजिक बदलाव की एक चुपचाप शुरू हुई क्रांति का प्रतीक भी है।