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धनबाद का सबसे बड़ा राजनीतिक संघर्ष: आठ साल बाद अदालत से बरी हुए पूर्व विधायक संजीव सिंह

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धनबाद।
कोयले की राजधानी धनबाद में राजनीति और रिश्तेदारी की जंग हमेशा सुर्खियों में रही है। 21 मार्च 2017 को हुए चर्चित नीरज सिंह हत्याकांड ने पूरे शहर को हिला दिया था। कांग्रेस नेता और पूर्व डिप्टी मेयर नीरज सिंह की सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस हमले में उनके तीन सहयोगी भी मारे गए थे। घटना के बाद पुलिस और राजनीति के गलियारों में सिर्फ एक नाम गूंज रहा था—झरिया से भाजपा विधायक रहे संजीव सिंह।

परिवार और राजनीति की जंग

नीरज सिंह सिंह मैंशन की नई पीढ़ी का चेहरा माने जाते थे। लेकिन पारिवारिक मतभेद और राजनीति की वर्चस्व की लड़ाई ने रिश्तों को दुश्मनी में बदल दिया। हत्या का आरोप नीरज के चचेरे भाई और उस समय भाजपा विधायक रहे संजीव सिंह पर लगा। यह संघर्ष केवल सत्ता का नहीं बल्कि सिंह परिवार के भीतर वर्चस्व की होड़ का प्रतीक बन गया।

गोलियों की गूंज से अदालत तक

हमले में ए.के.-47 और ऑटोमैटिक हथियारों के इस्तेमाल ने सनसनी फैला दी थी। घटना के तुरंत बाद संजीव सिंह को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। लंबे ट्रायल के दौरान कई गवाह पेश हुए, लेकिन सबूत अदालत में टिक नहीं पाए। सुप्रीम कोर्ट से स्वास्थ्य कारणों पर उन्हें ज़मानत मिली थी। और अब, 27 अगस्त 2025 को धनबाद की अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए संजीव सिंह समेत सभी आरोपियों को बरी कर दिया।

समर्थकों का जश्न

फैसले के बाद धनबाद की सड़कों पर आतिशबाज़ी और नारेबाज़ी के बीच संजीव सिंह का भव्य स्वागत हुआ। समर्थकों ने इसे ‘न्याय की जीत’ बताया और सिंह परिवार के राजनीतिक समीकरणों पर नई चर्चाओं को जन्म दिया।

राजनीति की नई तस्वीर – दो विधायकों की जंग

नीरज सिंह की हत्या के बाद उनकी पत्नी पूर्णिमा नीरज सिंह कांग्रेस से राजनीति में उतरीं और 2019 में झरिया से विधायक बनीं। वहीं, संजीव सिंह की पत्नी रागिनी सिंह ने 2024 के विधानसभा चुनाव में पूर्णिमा को हराकर झरिया सीट अपने नाम कर ली। अब झरिया की राजनीति दो महिलाओं—पूर्णिमा और रागिनी—के इर्द-गिर्द घूम रही है।

आगे क्या?

संजीव सिंह के बरी होने के बाद झरिया और धनबाद की राजनीति में नए समीकरण बनते दिख रहे हैं। बड़ा सवाल यह है कि क्या अब यह संघर्ष थमेगा या फिर सिंह परिवार की सियासत एक बार फिर नए दौर के टकराव की तरफ बढ़ेगी?