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घाटशिला उपचुनाव से पहले गरमाई सियासत, कांग्रेस–झामुमो के बीच प्रेसर पॉलिटिक्स तेज

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रांची/जमशेदपुर।
झारखंड की राजनीति में घाटशिला विधानसभा उपचुनाव को लेकर सरगर्मी तेज हो गई है। उपचुनाव की आधिकारिक घोषणा अभी बाकी है, लेकिन इंडिया गठबंधन के भीतर सीट को लेकर हलचल और खींचतान साफ दिखने लगी है।

सबसे आगे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद प्रदीप बलमुचू हैं, जो घाटशिला सीट पर अपनी पार्टी की दावेदारी जताने में सक्रिय दिख रहे हैं। उनके तेवर ने गठबंधन के भीतर दरार की आशंका को और बढ़ा दिया है।

कांग्रेस प्रदेश प्रभारी ने किया स्थिति स्पष्ट

कांग्रेस प्रदेश प्रभारी के. राजू ने प्रेस नोट जारी कर स्थिति साफ की है। उन्होंने झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी (जेपीसीसी) और जिला कांग्रेस कमेटी (डीसीसी) को निर्देश दिया है कि घाटशिला उपचुनाव में कांग्रेस की ओर से प्रत्याशी नहीं उतारा जाएगा, बल्कि झामुमो उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित करनी होगी।

राजू के इस बयान के बाद झामुमो नेताओं ने भी प्रतिक्रिया दी। पार्टी के केंद्रीय प्रवक्ता मनोज पांडेय ने कहा कि गठबंधन के सभी साथियों की जिम्मेदारी है कि वे ईमानदारी से इंडिया ब्लॉक के प्रत्याशी को जिताने का काम करें। बिना नाम लिए उन्होंने कांग्रेस के उन नेताओं पर भी तंज कसा, जिन्होंने पार्टी छोड़ छोटे दल का दामन थामा था और हार का सामना करना पड़ा था।

घाटशिला सीट पर झामुमो का मजबूत आधार

गौरतलब है कि घाटशिला विधानसभा सीट झामुमो का गढ़ रही है। 2019 और 2024 दोनों चुनावों में झामुमो प्रत्याशी रामदास सोरेन ने जीत दर्ज की थी। वर्ष 2024 में उन्होंने भाजपा प्रत्याशी बाबूलाल सोरेन को 22 हजार से अधिक वोटों से हराया था। चुनाव के बाद रामदास सोरेन को राज्य सरकार में शिक्षा मंत्री बनाया गया था।
हालांकि, 15 अगस्त को उनके आकस्मिक निधन के बाद यह सीट खाली हो गई। अब उपचुनाव बिहार विधानसभा चुनाव के साथ कराए जाने की संभावना है।

सोमेश सोरेन पर नजर, टिकट की दौड़ तेज

रामदास सोरेन के निधन के बाद अब चर्चा तेज है कि झामुमो से सोमेश सोरेन इंडिया ब्लॉक के उम्मीदवार हो सकते हैं। पार्टी कार्यकर्ता भी चाहते हैं कि पहले उन्हें मंत्री पद की जिम्मेदारी दी जाए और उसके बाद छह माह के भीतर चुनाव कराया जाए, जिससे जीत और आसान हो सके।
झारखंड की राजनीति में यह परंपरा रही है कि विरासत परिवार के सदस्यों को टिकट और पद दोनों दिए जाते हैं। लिहाजा यह देखना दिलचस्प होगा कि उपचुनाव में पार्टी किस रणनीति के साथ उतरती है और गठबंधन के भीतर तालमेल किस हद तक कायम रह पाता है।