रांची।
झारखंड में धानरोपनी का मौसम अपने चरम पर है। राज्य भर के किसान जहां खेतों में पसीना बहाकर अपने परिवार के साल भर के भोजन का इंतज़ाम कर रहे हैं, वहीं राजनीति के मैदान से निकलकर नेता और अफसर खेतों में ‘फोटो सेशन’ में व्यस्त दिखाई दे रहे हैं। सवाल यह है कि क्या ये नेता वाकई खेती को समझते हैं या सिर्फ कैमरे की चमक में ‘कृषक अवतार’ निभा रहे हैं?

कीचड़ में कदम नहीं, कैमरे के लिए पोज़
पिछले कुछ दिनों में कई नेता—चाहे वो सत्ता पक्ष से हों या विपक्ष से—खेतों में कीचड़ में उतरते नज़र आए। पारंपरिक वेशभूषा, हाथ में धान का पौधा और चेहरे पर मुस्कान… मानो किसी इवेंट की स्क्रिप्ट चल रही हो। इनमें सबसे पहले नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी की धानरोपनी वाली तस्वीरें सामने आईं, जिसके बाद मानो एक ट्रेंड ही बन गया।

‘मिट्टी से जुड़ाव’ या चुनावी तैयारी?
हर चुनाव से पहले यह दृश्य आम हो गया है कि नेता खेतों में जाकर किसान बनने का अभिनय करते हैं। लेकिन जब बात किसानों की समस्याओं की आती है—जैसे कि सिंचाई की व्यवस्था, समय पर बीज और खाद की उपलब्धता, फसल बीमा का भुगतान या न्यूनतम समर्थन मूल्य—तो वही चेहरे मौन हो जाते हैं।

प्रचार से आगे बढ़े सरकार
किसानों का कहना है कि केवल पब्लिसिटी से कुछ नहीं होगा। ज़रूरत इस बात की है कि सरकार धानरोपनी के मौकों को राजनीतिक शो से निकालकर किसानों की वास्तविक समस्याओं की ओर ध्यान दे। खेतों में उतरने का मतलब सिर्फ कीचड़ में पैर रखना नहीं, बल्कि किसानों की मेहनत और उनकी मांगों को प्राथमिकता देना है।
धानरोपनी: किसानों की पूजा, नेताओं का प्रचार?
यह सच्चाई है कि धानरोपनी झारखंड के लिए एक परंपरा और सांस्कृतिक उत्सव का प्रतीक है, लेकिन किसानों के लिए यह आजीविका और संघर्ष का हिस्सा है। इस मेहनत को मंच बनाकर कोई अपनी ब्रांडिंग करे, यह न सिर्फ किसानों का अपमान है बल्कि कृषि संस्कृति के साथ एक छल है।