रांची। झारखंड की राजनीति इन दिनों घाटशिला विधानसभा उपचुनाव के इर्द-गिर्द घूम रही है। सियासी रणभेरी बज चुकी है और अब चुनावी अखाड़ा पूरी तरह सज चुका है। यह मुकाबला खास इसलिए भी है क्योंकि यह सिर्फ दो उम्मीदवारों के बीच नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन की सीधी राजनीतिक टक्कर बन गया है।
भाजपा ने इस बार पूर्व सीएम चंपाई सोरेन के बेटे बाबूलाल सोरेन को उम्मीदवार बनाया है, जबकि झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने दिवंगत पूर्व मंत्री रामदास सोरेन के पुत्र सोमेश सोरेन पर भरोसा जताया है। दोनों ही दल इस सीट को अपनी साख और भविष्य की राजनीति के लिए अहम मान रहे हैं।
🔹 भाजपा ने उतारी दिग्गज प्रचारकों की फौज
घाटशिला उपचुनाव को लेकर भाजपा ने अपनी तैयारियों को अंतिम रूप दे दिया है और स्टार प्रचारकों की सूची जारी कर दी है। इसमें केंद्र और राज्य — दोनों स्तरों के दिग्गज नेताओं के नाम शामिल हैं।
सूची में सबसे ऊपर केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान का नाम है। उनके अलावा छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी, तथा झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्रियों बाबूलाल मरांडी, रघुवर दास, अर्जुन मुंडा और चंपाई सोरेन खुद मैदान संभालेंगे।
साथ ही, केंद्रीय मंत्री अन्नपूर्णा देवी और लक्ष्मीकांत वाजपेयी जैसे वरिष्ठ नेताओं की एंट्री ने चुनावी तापमान और बढ़ा दिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा घाटशिला को सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं, बल्कि कोल्हान की सियासी प्रतिष्ठा का केंद्र मान रही है।
🔹 2024 की हार की भरपाई का मिशन
2024 के विधानसभा चुनाव में झारखंड में भाजपा का प्रदर्शन उम्मीद के अनुरूप नहीं रहा था, खासकर कोल्हान क्षेत्र में। उस वक्त पार्टी सिर्फ एक सीट पर सिमट गई थी।
अब घाटशिला उपचुनाव को भाजपा “2024 की हार का बदला” और “2029 की तैयारी” के रूप में देख रही है।
पार्टी के संगठनात्मक ढांचे से लेकर जमीनी रणनीति तक हर स्तर पर इसे मिशन मोड में संचालित किया जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि भाजपा इस चुनाव के जरिए झारखंड में संगठनात्मक ऊर्जा को फिर से जगाने और जनसमर्थन को पुनर्जीवित करने की कोशिश में है।
🔹 चंपाई सोरेन की राजनीतिक अग्निपरीक्षा
यह उपचुनाव चंपाई सोरेन के लिए भी किसी राजनीतिक अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।
विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने झामुमो छोड़ भाजपा का दामन थामा था। हालांकि, उस चुनाव में भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली।
चंपाई सोरेन अपनी सीट तो बचा गए थे, लेकिन उनके बेटे बाबूलाल सोरेन घाटशिला से करीब 22 हजार वोटों से हार गए थे।
अब वही सीट एक बार फिर रणभूमि बनी है — जहां न केवल भाजपा की साख, बल्कि चंपाई सोरेन की राजनीतिक स्थिति भी दांव पर है।
सूत्रों के अनुसार, अगर भाजपा यह सीट जीतती है, तो चंपाई सोरेन का कद पार्टी में और ऊँचा हो सकता है।
साथ ही, यह नतीजा भाजपा के संगठनात्मक समीकरणों को भी नई दिशा दे सकता है।
🔹 झामुमो का भरोसा — जनाधार और सोरेन परिवार की विरासत
वहीं झामुमो इस चुनाव को अपनी परंपरागत सीट और जनाधार बचाने की जंग के रूप में देख रही है।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने स्वयं इस चुनाव को प्रतिष्ठा से जोड़ा है।
पार्टी कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर सोरेन परिवार की संघर्ष और सेवा की विरासत को जनता तक पहुंचा रहे हैं।
झामुमो को भरोसा है कि स्थानीय मुद्दे, विकास कार्य और क्षेत्रीय पहचान के सवाल उसके पक्ष में माहौल बनाएंगे।
इन दिनों घाटशिला झारखंड की सियासत का हॉटस्पॉट बन चुका है।
भाजपा जहां अपने स्टार प्रचारकों और मजबूत संगठन पर भरोसा कर रही है, वहीं झामुमो अपनी जड़ों और मुख्यमंत्री की लोकप्रियता के बल पर जीत की राह तलाश रही है।
अब सबकी निगाहें इसी पर टिकी हैं कि क्या भाजपा अपनी खोई जमीन वापस पा सकेगी, या झामुमो एक बार फिर कोल्हान में अपना किला बचाने में सफल होगी।