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बहरागोड़ा महाविद्यालय में “हीलिंग अर्थ, हीलिंग सेल्फ” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न, पर्यावरण, योग और आंतरिक शांति पर हुई सार्थक चर्चा

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बहरागोड़ा | संवाददाता (निलेश बेरा)

बहरागोड़ा महाविद्यालय में “हीलिंग अर्थ, हीलिंग सेल्फ: पर्यावरण, स्वास्थ्य और आंतरिक शांति” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन हुआ। इस संगोष्ठी का आयोजन महाविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग द्वारा, भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद (ICPR), शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के सौजन्य से किया गया।


पर्यावरण और योग आधारित जीवनशैली पर जोर

संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य पर्यावरणीय चेतना, शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य और भारतीय दर्शन पर आधारित जीवनशैली की प्रासंगिकता पर विचार साझा करना था। संगोष्ठी में देश भर के कई प्रतिष्ठित संस्थानों से आए विद्वान, प्रोफेसर, शोधार्थी और विद्यार्थी शामिल हुए। इनमें शामिल थे:

  • पटना विश्वविद्यालय
  • वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय (आरा)
  • भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय (मुजफ्फरपुर)
  • बनारस हिंदू विश्वविद्यालय
  • रांची विश्वविद्यालय
  • कोल्हान विश्वविद्यालय
  • सरला बिरला विश्वविद्यालय

वक्ता एवं विचार प्रमुख बिंदु:

  • प्रो. राजेंद्र प्रसाद (NIT जमशेदपुर): “योग और स्वच्छता को अपनाकर हम न केवल स्वयं को बल्कि पृथ्वी को भी स्वस्थ रख सकते हैं। पर्यावरण संरक्षण आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।”
  • प्रो. एन.पी. तिवारी (पटना विश्वविद्यालय): “योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक चेतना का माध्यम है। इसकी संपूर्ण यात्रा हमें आत्मिक शांति की ओर ले जाती है।”
  • डॉ. आभा झा: “योग जीवन का संतुलन है, विशेषकर युवाओं को इसे अपने दिनचर्याओं में शामिल करना चाहिए।”
  • डॉ. भूषण डॉक्टर बालकृष्ण बेहरा (अध्यक्ष): “भारतीय दर्शन और योग आधारित जीवनशैली न केवल हमारे शारीरिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है, बल्कि मानसिक शांति का भी स्रोत है।”

संगोष्ठी में सहभागिता और संगठन

इस आयोजन के मुख्य संरक्षक कोल्हान विश्वविद्यालय की कुलपति महोदया रहीं।
आयोजन सचिव की भूमिका में डॉ. डुमरेन्द्र राजन (प्रभारी, दर्शनशास्त्र विभाग) ने समस्त कार्यक्रम का सफल संचालन किया।
कॉलेज के सभी विभागों के शिक्षक और बड़ी संख्या में छात्रों ने भाग लेकर इस आयोजन को सफल बनाया।


राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्देश्य और प्रभाव

यह संगोष्ठी पर्यावरणीय संरक्षण, स्वास्थ्य संवर्धन और आंतरिक शांति जैसे विषयों पर गहन विचार-विमर्श का मंच बनी। वक्ताओं और विशेषज्ञों ने भारतीय परंपरा और दर्शन की आधुनिक प्रासंगिकता को स्पष्ट करते हुए समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में एक मजबूत संदेश दिया।