ताड़ और खजूर के पत्तों से सजने लगे ‘कूमा’, गांवों में उत्साह का माहौल
बहरागोड़ा | संवाददाता
जैसे-जैसे प्रखंड क्षेत्र में शीतलहर का असर बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे झारखंड की सांस्कृतिक पहचान मकर संक्रांति (टुसू पर्व) की तैयारियां भी तेज हो गई हैं। बहरागोड़ा के ग्रामीण अंचलों में खेतों और बागानों के बीच ताड़ व खजूर के पत्तों से बने ‘कूमा’ आकार लेने लगे हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में पर्व का उल्लास दिखाई देने लगा है।
सूखे पत्तों से आकार ले रही परंपरा
कूमा निर्माण की तैयारियों ने पकड़ी रफ्तार
सुबह की पहली किरण के साथ ही ग्रामीण इलाकों में चहल-पहल बढ़ जाती है। हाथों में ताड़ और खजूर के सूखे पत्ते लिए बच्चे और युवा कूमा बनाने में जुटे नजर आ रहे हैं। गांव की सड़कों पर अब केवल कोहरा ही नहीं, बल्कि पर्व की तैयारियों में डूबे ग्रामीणों का उत्साह भी साफ झलक रहा है। कई दिन पहले ही इन पत्तों को काटकर खुले मैदानों में सुखाया गया था, ताकि मकर संक्रांति से पहले कूमा को अंतिम रूप दिया जा सके।
नई पीढ़ी निभा रही परंपरा
बच्चों की भागीदारी बनी आकर्षण का केंद्र
इस बार बहरागोड़ा के ग्रामीण क्षेत्रों, खासकर स्वर्णरेखा नदी के किनारे बसे गांवों में एक सुखद दृश्य देखने को मिल रहा है। पर्व की तैयारियों में स्कूली बच्चे बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। बैलगाड़ियों पर ताड़ और खजूर के सूखे पत्ते लादकर लाते बच्चों की तस्वीरें न सिर्फ ग्रामीण जीवन की सादगी को दर्शाती हैं, बल्कि यह भी साबित करती हैं कि नई पीढ़ी अपनी संस्कृति और परंपराओं से गहराई से जुड़ी हुई है।
कूमा: सिर्फ ढांचा नहीं, सामूहिक एकता का प्रतीक
ग्रामीणों के अनुसार मकर संक्रांति पर कूमा बनाना इस क्षेत्र की विशिष्ट पहचान है। नदियों, तालाबों और अन्य जल स्रोतों के किनारे इनका निर्माण किया जाता है। कई स्थानों पर कूमों की ऊंचाई 20 फीट से लेकर 100 फीट तक होती है। यह केवल घास-फूस का ढेर नहीं, बल्कि गांवों की सामूहिक मेहनत, एकता और आस्था का प्रतीक माना जाता है।
मकर संक्रांति की सुबह होगा कूमा दहन
पवित्र स्नान के बाद अग्नि तापने की परंपरा
मकर संक्रांति (14 जनवरी 2026) की सुबह ग्रामीण जल स्रोतों में पवित्र स्नान करते हैं। इसके बाद नए वस्त्र धारण कर कड़कड़ाती ठंड के बीच कूमा दहन किया जाता है। अग्नि तापते हुए ग्रामीण अपने घरों की ओर लौटते हैं और पारंपरिक व्यंजनों के साथ पर्व की खुशियां मनाते हैं। इस परंपरा के साथ बहरागोड़ा का ग्रामीण जीवन संस्कृति, आस्था और सामूहिकता का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करता है।