चाकुलिया (बड़ामारा पंचायत) संवाददाता (रोहन सिंह) :
चाकुलिया प्रखंड के बड़ामारा पंचायत अंतर्गत टांगाशोल गांव के राम सोरेन और उनकी पत्नी सोमवारी सोरेन की बदहाली की कहानी सरकारी उदासीनता की खुली तस्वीर बन गई है। विगत 18 जून को भारी बारिश के कारण उनका झोपड़ीनुमा घर पूरी तरह ध्वस्त हो गया। घटना को 10 दिन बीत चुके हैं, लेकिन अब तक प्रशासन या पंचायत स्तर से कोई सहायता नहीं मिली है।
तिरपाल के नीचे रात्रि, केला के पेड़ के नीचे दिन गुजारने को मजबूर
55 वर्षीय राम सोरेन और उनकी 50 वर्षीय पत्नी सोमवारी सोरेन पिछले दस दिनों से टूटी झोपड़ी के पास एक तिरपाल के नीचे रातें काट रहे हैं। दिन के समय वे पास के एक केले के पेड़ की छांव में रहते हैं। बारिश और धूप से बचने के लिए उनके पास कोई और साधन नहीं है।
विद्यालय भवन में तीन रात बिताई, ग्रामीणों ने रोका
राम सोरेन ने बताया कि घटना के तुरंत बाद उन्होंने तीन रातें गांव के प्राथमिक विद्यालय भवन में बिताई थीं, लेकिन ग्रामीणों ने वहां सोने से मना कर दिया। तब से वे खुले में रहने को मजबूर हैं।
झोपड़ी मरम्मत के भी नहीं हैं पैसे, राशन कार्ड भी नहीं बना
राम सोरेन ने कहा कि उनके पास झोपड़ी की मरम्मत कराने के लिए भी पैसे नहीं हैं। उनका इकलौता बेटा गाडुम सोरेन रोजगार की तलाश में तमिलनाडु गया हुआ है। उन्होंने बताया कि उनका राशन कार्ड भी अब तक नहीं बना है, जिससे उन्हें खाद्य सामग्री प्राप्त करने में भी कठिनाई हो रही है।
खुले में बनाते हैं भोजन, सामान गांव वालों के घर में रखा
राम सोरेन और उनकी पत्नी टूटी झोपड़ी के पास खुले में ही भोजन बना रहे हैं। उनके घर का जो भी सामान बचा है, उसे गांव के ही एक व्यक्ति विराम मांडी के घर में सुरक्षित रखा गया है।
अंचल अधिकारी ने दिया था आश्वासन, अब तक नहीं हुई कार्रवाई
घटना की जानकारी मिलने के बाद अंचल अधिकारी नवीन पुरती ने कहा था कि राम सोरेन को सरकारी सहायता दी जाएगी और कर्मचारी मौके पर जाकर स्थिति का जायजा लेंगे। लेकिन 10 दिन बीत जाने के बावजूद न तो कोई कर्मचारी पहुंचा और न ही कोई मदद दी गई है।
प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर उठे सवाल
गांव में चर्चा है कि जब इतनी बड़ी घटना के बाद भी कोई सहायता नहीं मिलती, तो गरीब कहां जाएं। प्रशासन और पंचायत के जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर अब सवाल उठने लगे हैं। ग्रामीणों ने इस मामले में शीघ्र कार्रवाई की मांग की है।
बीते दो-तीन दिनों से हो रही लगातार बारिश ने राम सोरेन दंपत्ति की तकलीफें और बढ़ा दी हैं।
भीगते तिरपाल के नीचे रात गुजारना अब असंभव हो गया है, इसलिए वे एक बार फिर मजबूरी में गांव के प्राथमिक विद्यालय में शरण लेने लगे हैं। जहां कभी उन्हें रोका गया था, अब वहीं ठिठुरती रातों में आसरा मिल रहा है। यह दृश्य न सिर्फ सरकारी संवेदनहीनता को उजागर करता है, बल्कि यह भी बताता है कि एक बेघर गरीब दंपत्ति के पास कितने सीमित विकल्प बचे हैं।
निष्कर्ष:
टांगाशोल गांव के राम सोरेन और उनकी पत्नी का जीवन प्रशासनिक लापरवाही का जीवंत उदाहरण बन चुका है। सरकारी योजनाएं और राहत की घोषणाएं सिर्फ कागजों तक सीमित नजर आती हैं। अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या प्रशासन और पंचायत मिलकर इस बेघर दंपत्ति को न्याय दिला पाएंगे?