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टेंडर घोटाले को लेकर झारखंड में सियासी घमासान, भाजपा ने सीबीआई जांच की मांग की, झामुमो ने बताया राजनीतिक साजिश

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रांची:
झारखंड की सियासत में एक बार फिर भूचाल आ गया है। इस बार मामला सीधे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के अधीन गृह विभाग में कथित टेंडर घोटाले से जुड़ा है। भारतीय जनता पार्टी ने पूरे प्रकरण को एक “संगठित टेंडर सिंडिकेट” करार देते हुए सीबीआई जांच की मांग की है। वहीं, सत्ता पक्ष झारखंड मुक्ति मोर्चा ने इन आरोपों को “राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित” बताया है।

भाजपा का आरोप: नियमों को ताक पर रखकर बांटे गए ठेके

भाजपा प्रवक्ता अजय साहू ने आरोप लगाया कि गृह विभाग की कई निविदाओं (टेंडर) में भारी गड़बड़ी हुई है। उन्होंने JEM/2022/B/2317532 टेंडर का हवाला देते हुए बताया कि 23 में से 20 कंपनियों को जानबूझकर तकनीकी कारणों से बाहर कर दिया गया, जिससे कुछ चुनींदा कंपनियों को ही ठेका दिया जा सके।

एक अन्य टेंडर GEM/2022/B/2498791 का जिक्र करते हुए भाजपा ने तीन कंपनियों—जे.सी. माइकल (कोलकाता), अरिहंत कॉर्पोरेशन (पटना) और लाइफलाइन सिक्योरिटी (दिल्ली)—का नाम लिया, जिनके निदेशकों के आपस में संबंध होने का दावा किया गया है।

भाजपा ने सवाल उठाया कि GeM पोर्टल के नियमों के अनुसार, एक व्यक्ति दो कंपनियों से टेंडर प्रक्रिया में हिस्सा नहीं ले सकता, फिर भी कैसे इन्हें ठेका दिया गया? उन्होंने इसे “कानून का उल्लंघन और गंभीर प्रशासनिक लापरवाही” बताया।

झामुमो का पलटवार: आदिवासी नेतृत्व को असहज करने की साजिश

झामुमो महासचिव विनोद पांडेय ने भाजपा के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यह सब सत्ता की भूख से प्रेरित झूठ और भ्रम फैलाने की कोशिश है। उन्होंने कहा कि भाजपा को यह स्वीकार नहीं हो रहा कि राज्य में आदिवासी नेतृत्व गरीबों, किसानों और मजदूरों के पक्ष में मजबूत फैसले ले रहा है।

पांडेय ने भाजपा पर पलटवार करते हुए पूछा, “अपने कार्यकाल में इन्होंने कितने अस्पताल खोले? कितने युवाओं को नौकरी दी?” उन्होंने चुनौती दी कि भाजपा तथ्य और आंकड़ों के साथ सामने आए, वरना सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस से विकास नहीं होता।

क्या जांच होगी या मामला दब जाएगा?

इस पूरे मामले में आरोपों और प्रत्यारोपों के बीच सरकारी टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। भाजपा द्वारा जिन दस्तावेजों और नामों का जिक्र किया गया है, वे जांच की मांग को उचित ठहराते हैं। दूसरी ओर, झामुमो के जवाब में भावनात्मक अपील तो है, लेकिन तकनीकी तथ्य कम दिखते हैं।

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खुद सामने आकर स्थिति स्पष्ट करते हैं या मामला महज़ बयानबाजी तक सिमट कर रह जाएगा।