अबुआ खबर डेस्क, रांची
आगामी जनगणना को लेकर झारखंड में आदिवासी समाज के बीच अपनी धार्मिक पहचान दर्ज कराने की मांग तेज हो गई है। विभिन्न इलाकों में आयोजित बैठकों में यह निर्णय लिया गया है कि समुदाय के लोग जनगणना के दौरान धर्म के कॉलम में अपनी पहचान ‘सरना’ के रूप में ही दर्ज कराएंगे।
इस अभियान का नेतृत्व पारंपरिक आदिवासी व्यवस्था से जुड़े संगठन माझी परगना महाल कर रहा है। समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि प्रकृति-पूजक आदिवासी समुदाय की आस्था मुख्यधारा के धर्मों से अलग है, इसलिए उन्हें अलग पहचान मिलना जरूरी है।
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सीमित विकल्पों पर नाराजगी
आदिवासी समुदाय ने जनगणना में धर्म के लिए सीमित विकल्प दिए जाने पर असंतोष जताया है। उनका मानना है कि जब उनकी परंपराएं और आस्था अलग हैं, तो उन्हें अलग कोड और पहचान भी मिलनी चाहिए।
संविधान का दिया हवाला
समाज के नेताओं का कहना है कि भारतीय संविधान हर नागरिक को अपनी आस्था चुनने की स्वतंत्रता देता है। इसी आधार पर वे ‘सरना’ को एक अलग धार्मिक पहचान के रूप में मान्यता देने की मांग कर रहे हैं।
गांव-गांव चलाया जाएगा अभियान
इस मुद्दे को लेकर अब गांव स्तर पर जागरूकता अभियान शुरू किया जा रहा है। पंचायतों में बैठकें कर लोगों को समझाया जा रहा है कि जनगणना के समय वे अपनी धार्मिक पहचान स्पष्ट रूप से ‘सरना’ दर्ज कराएं। इसके लिए स्वयंसेवक घर-घर जाकर लोगों को जागरूक करेंगे।
पहचान और अस्तित्व का सवाल
आदिवासी संगठनों का कहना है कि यह केवल एक कॉलम भरने का मुद्दा नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान और अस्तित्व से जुड़ा मामला है। उनका मानना है कि अलग पहचान नहीं मिलने से उनकी जनसंख्या और परंपराओं का सही आंकलन नहीं हो पाता।
फिलहाल, इस मांग को लेकर राज्य में माहौल गर्म होता दिख रहा है और समाज के लोग एकजुट होकर अपनी पहचान को आधिकारिक मान्यता दिलाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।